बेडरूम से लेकर वार रूम तक उन्मादी मीडिया

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यूं तो भारतीय मीडिया खासकर टेलीविजन मीडिया के बौड़मपन का नमूना उस वक्त देश समेट पूरे विश्व मीडिया ने भी देखा था कि , किस तरह , गैर जिम्मेदार होकर , टेलीविजन कैमरामैनों व् पत्रकारों ने अंधाधुंध सभी संवेदनशील समाचारों को न सिर्फ दिखाया बल्कि सेना व् सुरक्षा बलों की भविष्य की कार्यवाहियों और योजनाओं को भी इतना खोल खोल के बता समझा दिया कि वहीँ छुप कर बैठे आतंकियों ने भी न सिर्फ उसे देखा बल्कि उसको देख कर अपनी रणनीति भी बना ली | बाद में जब भूल का अंदाजा हुआ तो कमांडोज और पुलिस बल की सख्ती के बाद मीडिया को भी अपनी गलती का एहसास हुआ |

लेकिन ये एहसास भी क्षणिक ही रहा , क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अति संवेदनशील विषय और सीमा क्षेत्र में रिपोर्टिंग , कवरेज , कैमरे और वीडियो फुटेज , शूटिंग और प्रसारण आदि जैसे बिन्दुओं पर न तो कभी मीडिया में कभी गंभीरता से सोचा विचारा गया है तो इस दिशा में नीति और दिशा निर्देशों की तो बात ही दूर है | ये सब तो खैर जब बनेगा तब बनेगा मगर कैमरा और माईक पकडे हुए पत्रकार और साथी , पेशेवराना रुख तो बहुत बाद की बात है मगर एक भारतीय नागरिक के रूप भी कम से कम इतना अंदाजा तो सहज ही लगा सकते हैं कि जिन ख़बरों दृश्यों को वे समेट रहे हैं उनके प्रसारण का क्या और कितना प्रभाव और किस पर पड़ेगा |

पोस्ट लिखे जाते समय भी जब मैं आजतक समाचार चैनल देख रहा हूँ तो उसका एक रिपोर्टर बाखुशी फख्र से ये दिखा बता और समझा रहा है वो भी पूरी तफसील से कि वो भारत की सीमा पर बने आख़िरी बंकर से सीधे दर्शकों के लिए वो सब पहली बार एक्सक्लूसिव अपने चैनल पर सिर्फ इसलिए दिखा रहा कि उससे वो ख़ास चैनल देख रहा दर्शक देश के अन्य चैनल देख रहे दर्शकों से इस मामले में ज्यादा तेज़ और ज्यादा विशिष्ट हो जाएगा | उस पत्रकार को , उस टीवी चैनल को , और उसे देख रहे दर्शक को भी कहीं से ये गुमान नहीं होता कि उसके उन भारतीय दर्शकों के अलावा कुछ ऐसे अनचाहे अवांछित दर्शक भी हैं और देख रहे हैं जिन्हें ये सब देखने दिखाने के लिए कई बार अपनी जान जोखिम में डालना पड़ता |

समाचारों का प्रस्तुतीकरण , एंकर का हावभाव , उत्तेजित शैली , अधूरी जानकारी , श्रवण और दृश्य के संयोजन की तकनीक से अधिक पारदर्शिता उत्पन्न करने के स्थान पर अधिक सनसनी पैदा करने की कोशिश की जाती है | रही सही कसर , ऊल जलूल परिकल्पनाओं पर आधारित और अधिकतर टीवी पर पूरे दिन आ रहे धारावाहिकों , रियलिटी शोज़ आदि की क्लिपिंग पर घंटो कार्यक्रम बना कर परोसते ये तमाम समाचार चैनल अब सिर्फ एक नौटंकी भर बन कर रह गए हैं |


और सबसे दुखद बात ये है कि कमोबेश सभी बड़े छोटे समाचार चैनल आज इसी उन्माद और व्यावसायिक दौड़ जिसे आम बोलचाल की भाषा में टीआरपी की दौड़ भी कहा जाता है , में बेतहाशा दौड़े चले जा रहे हैं | इनमें नवीनता , नए प्रोजेक्ट्स , नए स्थानों , नए अन्वेषणों , नई श्रृंखलाओं , का घोर अभाव सा दिखता है | अपराध , राजनीति , भ्रष्टाचार , नारी दमन …कोई भी विषय हो , कैसी भी घटना या दुर्घटना हो इन समाचार चैनलों में उसका प्रस्तुतीकरण किस तरह से कब और कैसे रूप में कर दिया जाए , ये अब कोई नहीं जानता  |

हालांकि ऐसे नहीं कि स्थति इतनी निराशाजनक है कि हताश हो कर बैठ जाया जाए , नहीं ऐसा कदापि नहीं है , विशेषकर आज के दौर में जहां एक नए समाचार माध्यम , जो अन्य किसी भी माध्यम से कहीं अधिक तेज़ और प्रभावकारी है और वो है अंतरजाल से जुडा समाज यानि सोशल मीडिया या जन संचार का आभासी जगत | और ये तंत्र अपनी असीमित शक्ति और प्रभाव के कारण बहुत कम समय में ही एक न उपेक्षित किये जा सकने वाला स्तम्भ बन कर उठ खड़ा हुआ है | सच कहा जाए तो कहा जा रहा है कि अंतर्जालीय लेखन और विशेषकर सोशल मीडिया ने उन चिरागों की तलहटी में सूरज रख दिया जहां सदियों से बहुत सारा अन्धेरा जमा हो रहा था | मगर फिर डर तो वहां भी बना ही हुआ है कि , और अधिक् बना हुआ है | ज्यादा ताकत के साथ ज्यादा जिम्मेदारी का एहसास और उसमें कमी होने पर बहुत ज्यादा नुक्सान का अंदेशा तो हमेशा बना ही रहता है , किन्तु इन सबके बावजूद फिलहाल इसका रुख सकारात्मक अधिक है अभी |

टेलीविजन मीडिया में आज जो मंडीनुमा संस्कृति पनप रही है यदि उसे बहुत जल्द ही नीति निर्देशों और नियमों में नहीं परिभाषित ,नियंत्रित किया गया तो एक दिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडिया की आज़ादी के नाम पर लोगों के सामने जाने क्या और कितना परोस दिया जाएगा वैसे भी आज मीडिया के दायरे में बेडरूम से लेकर वार रूम तक सब कुछ मीडिया की  ज़द और हद में है , अगर कुछ हद में नहीं है, आत्मनियंत्रण में नहीं है ,तो वो है खुद मीडिया हाउसेज़ , प्रोडक्शन टीम , थिंक टैंक , नए रिपोर्टरों की जिजीविषा , जाने कहाँ गुम हैं सारी की सारी  ……जरूरी अब ये है कि खुद के गिरेबान में भी झांकना शुरू करें कैमरे ……और जहां जरूरी न हों वहां बिन ख़बरों बिन कैमरों के भी ज़िंदगी को चलने दिया करें ……हर बात खबर ही हो जरूरी तो नहीं

हिंदी ही हिन्दी …….

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चलिए जी हिंदी दिवस तो बीत लिया |सुना है कि राज्धान्दी दिल्ली में ,  पिछले कई वर्षों से (हिंदी पखवाड़े में ) दिल्ली सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा राज्य सरकार में कार्यरत कर्मचारियों व् अधिकारियों के लिए आयोजित की जाने वाली परीक्षाएं भी अभी तक किसी कारणवश नहीं आयोजित की जा सकी है || वर्तमान में दिल्ली के जो चिकित्सकीय हाल है उसमें इन सब बातों के लिए दिल्ली सरकार पूरी तरह क्षम्य है सो इसकी ज्यादा  खुर्दबीन करने का कोइ अर्थ नहीं है |

तो मैं बात कर रहा था हिंदी की जैसा कि हमारी आदत है कि अक्सर सितंबर के शुरुआत में  सरकार,  प्रशासन ,साहित्य समाज टीवी ,हम खुद भी हिंदी का जाप करने लगते हैं , इसमें असल में दो तरह की बातें हैं एक आखिर हमें इस देश में जरूरत ही क्या है हिंदी दिवस हिंदी पखवाड़ा वो भी उत्तर भारतीय क्षेत्रों में तो निश्चित रूप से यह एक औपचारिकता भर बन कर रह जाता है | फिर हिंदी कहाँ नहीं है , घर से लेकर दफ्तर तक , बाज़ार से लेकर सिनेमा तक , संगीत से लेकर झगडे तक हर जगह हिंदी का सीना अंगरेजी से बहुत चौड़ा ही दिखता है |

और ये जो बातें बनाई जाती हैं हैं कि अंग्रेजीदां होना ही इस देश में भी बढ़ने की निशानी है तो ये बेशक एक रास्ता होगा और बहुतों को ऐसा लगा भी होगा लेकिन यकीन जानिये ऐसा है और फिर आज विशुद्ध रूप से हिंदी भाषी अपने लोकप्रिय वाककला और विशिष्ट हिद्नी के प्रयोगों से विश्व को चकित किये हुए है | हाल ही में विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका की संसद ने पूरे विश्व में से जिस राजनेता को सुनने के लिए विशेष रूप से आमंत्रित किया था वो हिंदी का ही वक्ता है |

आज मोबाईल फोन और उसमें न सिर्फ हिंदी अंग्रेज़ी बल्कि बहुत सारे क्षेत्रीय भाषाओं में भी अभिव्यक्ति के रास्ते खोल दिए हैं , रही सही कसर टीवी व इलेक्ट्रोनिक मीडिया और उन सबसे बढ़कर सोशल मीडिया में हिंदी की बढ़ती धमक कहीं से भी हिंदी के कमज़ोर होने का एहसास नहीं दिलाती इसलिए सबसे पहले ये जरूरी है कि हिंदी को किसी सिंकारा टॉनिक की जरूरत है इसे निकाल कर बाहर फेंक देने की जरूरत है | हिंदी को किसी बैसाखी और आरक्षण की जरूरत न तो कभी थी और न आगे कभी रहेगी |हाँ मगर चादर तान के अकड के सोने वाली स्थिति भी नहीं है ..

ये तो हुआ अच्छा अच्छा , आज सत्तर वर्षों के बाद भी सर्वोच्च न्यायालय , केंद्र सरकार , राज्य सरकारें , संस्थाएं व्  दफ्तर ..यानि , हिंदी को समृद्ध व् प्रमाणीकरण की भाषा बनाने वाली जुगतों , यानि तकनीकी हिंदी , प्रशासनिक किन्तु सरल हिंदी , विधिक , यांत्रिक , चिकित्सकीय .. इनके साथ ही हिंदी अंतर्जाल पर भी और जाने कितने ही क्षेत्रों में हिंदी में काम किये जाने की जरूरत है ….और हमें मिल कर करने की जरोरत है तो फिलहाल तो जय हिंदी , हिंदी हिंदी ..हिंदी ही हिंदी ……

खबरों की खबर >>>>खबड खबड

 

 

 

news

 

मोदी ने की उद्धव ठाकरे से बात , गीते ने संभाला कार्यभार
मोदी ने यही कहा होगा , क्या है बे , बात बेबात फ़ैल जाते हो , अब पाकिस्तान चीन से निपटें कि तुमसे , चुप्पे सीट संभाल लो न त जहां इत्ते मंत्रालय एडजस्ट हो गए , एक और न हो पाएगा क्या

 

मंत्री अपने रिश्तेदारों को कोई सरकारी ठेका न दिलवाएं :पीएम
हां अद्धा, पव्वा वे जरूर उन्हें दिलवा सकते हैं

 

मोदी ने किया चीन के राष्ट्रपति को फ़ोन
जरूर यही समझाया होगा कि अपने नाटों को संभाल लो , वर्ना हम चाउमीन में बांध के पीटेंगे किसी दिन

 

विपक्ष के नेता का भार राहुल गांधी को ही दिया जाना चाहिए :दिग्विजय सिंह
देखा इसे कहते हैं देशभक्ति , नई नई शादी से फ़ुर्सत निकाल के देश के प्रति चिंता ज़ाहिर कर रहे हैं चचा

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 गांव से ईश्वर काका फ़ोन करके पूछ रहे हैं कि आखिर इत्ते सारे लोग एक साथ खडे होकर ,माइक पर बोल बोल कर उनकी शपथ क्यों उठा रहे हैं 

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अरे आप मेरी बगल में बैठेंगे : नवाज़ शरीफ़ मनमोहन सिंह से
क्यों नहीं , मैं “इंडिया” को रिप्रेजेंट कर रहा हूं , हिंदुस्तानी पीएम ने मुझे भी इनवाइट किया है  

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खबर है कि शत्रुघ्न सिन्हा को मंत्री पद की शपथ इसलिए नहीं दिलाई गई है क्योंकि दो शब्द के बीच में वे एक बार जरूर बोलते हैं …………….खामोश

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शपथ समारोह में राहुल गांधी ने सोनिया गांधी के कान में पूछा
ममा ………..इन लोगों ने डोरेमॉन को इनवाइट क्यों नहीं किया , मैं उसे क्या जवाब दूंगा 

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शपथ ग्रहण समारोह के दौरान हेमामालिनी धर्मेंद्र से , रात्रि भोज के लिए पानी तो Kent प्यूरीफ़ायर का ही यूज़ होगा न 

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नरेंद्र मोदी भारत के 15वें प्रधानमंत्री नियुक्त किए गए
मायावती देश को आज संबोधित करके कहेंगी ……………बसपा तो सरकार को कतई समर्थन नहीं देगी 

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कार्यक्रम के दौरान ,पाकिस्तान से नवाज़ शरीफ़ को फ़ोन आया
सर , जल्दी वापस आ जाइए , मुशर्रफ़ कह रहा है कि आप उसे काम देखने को कह गए हैं 

फ़ैसले के बाद माकूल सज़ा के विकल्प (संदर्भ दिल्ली बलात्कार कांड)

 

 

 

 

आखिरकार उस अपराध का पहला फ़ैसला आ ही गया जिसने भारत के इतिहास में पहली बार आम लोगों को इतना झकझोर दिया था कि वे सीधा रायसीना की पहाडियों की छाती रौंद कर देश के कानून निर्माताओं को ललकारने पर उतारू हो गया थे । दिल्ली के कुख्यात बलात्कार कांड में एक मासूम युवती का बेहरहमी से बलात्कार करके उसके शरीर को इतना प्रताडित किया कि लाख कोशिशों के बावजूद उसकी जान तक नहीं बचाई जा सकी । इस कांड में पकडे गए आरोपियों को जब कानूनी प्रक्रिया के तहत अदालती कार्रवाई के लिए प्रस्तुत किया गया तो जैसा कि किसी भी आरोपी को गिरफ़्तार करते समय पुलिस निर्धारित नियमों का पालन करती है , जिसमें से एक होता है आरोपी की उम्र जिसके अनुसार ही उसपर मुकदमा चलाया जाता है । 

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आरोपी की उम्र का निर्धारण या उल्लेख पुलिस को उसे चार्ज़शीट करते हुए इसलिए करना होता है क्योंकि यदि अभी की निर्धारित उम्र , जो कि अठारह वर्ष है , से कम पाए जाने पर वह मुकदमा , जुवेनाइल जस्टिस एक्ट , 1986  के तहत जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड यानि किशोर अपराध समिति की अधिकारिता में आता है । यहां ये बताना ठीक होगा कि ऐसा बोर्ड , जिसके प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट एक प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी होते हैं उनके साथ ही बोर्ड में अन्य विविध क्षेत्रों के अन्य सदस्य भी मामले को सुनते हैं । इस कानून के तहत , किसी भी किशोर अपराधी को दोषी पाए जाने पर अधिकतम तीन वर्ष की सज़ा सुनाई जाती है तथा उसे ये सज़ा किसी कारागार में न बिताकर सुधार गृह में बितानी होती है । इसके पीछे विधिक और सामाजिक विद्वजनों का तर्क ये था कि चूंकि कम उम्र में किए गए अपराध के लिए भविष्य में उसे सुधरने और समाज की मुख्य धारा में लाए जाने का अवसर दिया जाना चाहिए , इसलिए यही उसका उचित उपाय है । 

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इस बलात्कार कांड में जब एक आरोपी के नाबालिग होने का दावा आरोपी ने किया तो उसकी निर्धारित तय सज़ा , जो कि आज उसे सुनाई गई , यानि अधिकतम तीन वर्ष , के मद्देनज़र इसका तीव्रतम विरोध इसलिए हुआ क्योंकि इसी नाबालिग आरोपी ने पीडिता युवती के साथ सबसे बर्बर व्यवहार , इतना कि ईलाज़ कर रहे डाक्टरों की टीम को खुद कहना पडा कि ऐसा नृशंस व्यवहार उन्होंने पहले नहीं देखा , किया था । इसी समय कुछ संगठनों एवं लोगों ने बरसों पुराने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में निर्धारित उम्र सीमा को घटाने की मांग उठाई क्योंकि खुद पुलिस का मानना था कि अपराध में किशोरों की बढती संलिप्तता के कारण ऐसा किया जाना जरूरी है । 

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इसी समय सरकार की तरफ़ से दो कार्य किए गए । पहला था देश भर के पुलिस अधिकारियों की बैठक जिन्होंने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत तय उम्र सीमा को कम किए जाने की सिफ़ारिश की । दूसरा था बलात्कार को लेकर सरकार द्वारा बनाए और बदले जा रहे कानून के संदर्भ और सुझाव के लिए गठित जस्टिस वर्मा समिति जिसे भी इस मुद्दे पर राय देनी थी । लेकिन जस्टिस वर्मा समिति ने पुलिस और लोगों की उठती मांग के विपरीत इसी उम्र को सही ठहराया । फ़लस्वरूप सरकार यौन शोषण के लिए परिवर्तित किए गए कानून में इसे कम नहीं कर सकी । विधिज्ञ बताते हैं कि सरकार चाहती तो जस्टिस वर्मा समिति की सिफ़ारिश के विपरीत जाकर इस उम्र को कम कर सकती थी किंतु इस स्थिति में उसे वैश्विक न्याय प्रचलनों और मानवाधिकार नियमों के खिलाफ़ जाने का खतरा उठाना पडता । 
 

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इसका परिणाम ये हुआ कि दिल्ली बलात्कार कांड के इस सबसे ज्यादा खतरनाक आरोपी जिसने खुद के नाबालिग होने का दावा किया उसे किसी सख्त सज़ा मिलने की संभावनाओं पर पानी फ़िरता दिखा । चूंकि आरोपी ने अपने दावे के पक्ष में विद्यालय का प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया जिसे उस विद्यालय के प्रधानाचार्य ने सत्यापित किया , और इस स्थिति में पुलिस के मात्र एक मात्र विकल्प बचा था आरोपी के इस दावे को झुठलाने के लिए उसका ossification test ( एक ऐसी चिकित्सकीय वैज्ञानिक जांच जिसे आम तौर पर हड्डी जांच से उम्र तय करने वाली जांच कहा जाता है ) कराया जाए , किंतु कानूनन ऐसा तब हो सकता था जब आरोपी द्वारा अपने नाबालिग होने के लिए प्रस्तुत साक्ष्य अदालत को संदेहास्पद लगे , किंतु बदकिस्मती से इस मुकदमें में ऐसा नहीं हुआ । 
 
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जैसे जैसे मुकदमा आगे बढता गया इसके संभावित फ़ैसले को भांपते हुए इसे रोकने और आरोपी को सख्मुत सज़ा दिलाने के उद्देश्य के लिए जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को इस मुकदमे का फ़ैसला सुनाने के लिए अपील की याचिका दायर की गई जिसे स्वाभाविक रूप से उच्च अदालत ने खारिज़ कर दिया । मुकदमा  चला और पुलिस द्वारा चार्ज़शीट कुल बारह धाराओं में से ग्यारह में उसे दोषी ठहराते हुए आज तीन वर्ष की अधिकतम सज़ा सुना दी । 
 
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अब सवाल ये है कि अब जबकि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने अपना फ़ैसला वो भी निर्धारित अधिकतम सज़ा सुना ही दी है तो अपील के लिए क्या गुंजाईश बचती है ?? किंतु भारतीय कानून इतना विस्तृत और बहुस्तरीय  है कि विकल्प निकल ही आता है । सर्वोच्च न्यायालय ने जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को इस मुकदमे का फ़ैसला सुनाने से रोकने की याचिका तो को तो खारिज़ कर दिया किंतु इसके साथ ही इस कानून के तहत  “नाबालिग” की परिभाषा तय करने संबंधी प्रार्थना स्वीकार कर ली जिस पर निर्णय आना अभी बांकी है । कानून के ज्ञाता भलीभांति जानते हैं कि यदि सर्वोच्च न्यायालय ने नाबालिग की परिभाषा को तय करने में विशेषकर मुकदमे के संदर्भ में कोई नया फ़ैसला सुना दिया जैसा कि सर्वोच्च अदालत पहले भी कर चुकी है तो ये न सिर्फ़ इस मुकदमे के इस आरोपी को उसके अंज़ाम ,जो उस बदली हुई परिस्थिति में मौत भी हो सकती है को , तक पहुंचा देगा बल्कि अदालतों को इस मौजूदा कानून के तहत ही इतनी शक्ति दे देगा कि वो मुकदमे के हालात को देखकर फ़ैसला सुना सकेंगी ।
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ज्ञात हो कि सर्वोच्च अदालत ने कुछ वर्षों पहले एक मुकदमें  जिसमें दो नाबालिगों ने घर से भागकर आपस में विवाह कर लिया था को न सिर्फ़ पूरी तरह वैध ठहराया बल्कि अपने तर्कों और विश्लेषण से ये भी साबित किया कि चूंकि उनकी शरीरिक और मानसिक क्षमता व परिपक्वता ऐसी है इसलिए ,उन्हें अठारह वर्ष से कम उम्र होने के बावजूद भी नाबालिग नहीं माना जा सकता । इसलिए अभी ये कहना कि न्याय के लिए लडी गई लडाई व्यर्थ हो गई , या इस फ़ैसले से अपराधियों के ,विशेषकर किशोर अपराधियों के , खासकर आतंकियों के हौसले बुलंद हो सकते हैं , थोडी सी जल्दबाज़ी होगी । ध्यान रहे कि अभी इस मामले से जुडे अन्य आरोपियों पर न्यायालय का फ़ैसला आना बांकी है जिसके बाद इस नाबालिग आरोपी ,जिसका अपराध बांकी अन्य आरोपियों से ज्यादा गंभीर माना जा रहा है , की कम सज़ा पर नि:संदेह न्यायविदों की भी पूरी नज़र होगी । एक अच्छी बात ये है कि अभी इस आरोपी को कम से कम ढाई वर्ष तक सुधार गृह में ही रहना होगा और इस बीच न्यायपालिका इस मुद्दे पर किसी ठोस नतीज़े पर पहुंच जाएगी  , ये उम्मीद की जानी चाहिए ।

तरकश के तीर ——>>

news
खडी खबड : सरकार फ़ैसला लिया , अब “अर्थशास्त्र” को “अनर्थशास्त्र” के नाम से पढाया जाएगा 🙂
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खडी खबड : समाजवादी पार्टी के विधायक महेंद्र सिंह पार्टी से निकाले गए
ओह पहले “मौज मस्ती वाली पार्टी “से अब गुंडागर्दी वाली पार्टी से भी 🙂
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खडी खबड : सरकार जल्दी ही पेट्रोल डीज़ल के दाम बढाने पर फ़ैसला लेगा
हुंह्ह सरकार का घंटा फ़ैसला लेगी , तेल कंपनियां लेंगी , सरकार तो फ़ैसला पढ के सुनाएगी 🙂
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खडी खबड : रुपया गिरता ही जा रहा है ऐसे में गरीबों का पेट कैसे भरा जाएगा
सरकार : पहले हमने गरीबों को गड्ढे में गिराया अब रुपए को गिरा रहे हैं ,
यही तो इकोनोमिक्स है जी , समझते हैं नहीं हुंह्ह 🙂
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NDTV पर एंकर , हमारे साथ जुड चुके हैं कांग्रेस प्रवक्ता संजय झा , इनसे हम पूछेंगे कि …
संजय झा : मैं इससे बिल्कुल असहमत हूं 🙂
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खडी खबड : समाजवादी पार्टी प्रदेश में रेत बालू के अवैध खनन में लिप्त नहीं है ,
बिल्कुल ठीक , उसके कुछ कर्मवीर तो गोआ में कुछ और ही खोद रहे थे 🙂
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खडी खबड :खाद्य सुरक्षा योजना पर सिर्फ़ नब्बे हज़ार करोड रुपए ही खर्च किए जाएंगे
और रुपया सुरक्षा योजना पर ??? 🙂
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खडी खबड : रुपया और बुरी हालत में :68.75 तक गिरा ,चिंता की कोई बात नहीं , गिराने के लिए धक्का खुद इकोनोमिक्स वाले डाक्टर साब दे रहे हैं , चोट नहीं लगने देंगे 🙂
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खडी खबड : राहुल गांधी ने इकनोमिक्स चचा से पूछा कि रुपया गिर रहा और सोना ऊपर उठ रहा है तो बैलेंस बनाने के लिए क्यों न सोने के रुपए छापे जाएं 🙂 ************
खडी खबड : फ़ैसला सुनाते हुए सावधानी बरतें कोर्ट : कपिल सिब्बल
कोर्ट : राजनीतिज्ञ भी तो घोटाले/घपले/भ्रष्टाचार/अपराध करते हुए सावधानी बरतें 🙂
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खडी खबड : देश का राजनैतिक वर्ग सबसे अधिक जवाबदेह है :कपिल सिब्बल
सभी सवालों के जवाब से मेरी खामोशी अच्छी : प्रधान राजनीतिज्ञ 🙂
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खडी खबड :पुत्तर प्रदेस के मुख मंतरी ने “बाल रोगी विभाग” का उदघाटन किया
राहुल गांधी ने , उन्हें विशेष रूप से धन्यवाद कहा 🙂
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वन टू थ्री फ़ोर , जेल से चुनाव लडेंगे चोर ,
नहीं कोई अब हिचक झिझक , सब कुछ बेहिचक ,
ढिंच्चक ढिंच्चक , ढिंच्चक ढिंच्चक ,ढिंच्चक ढिंच्चक , ढिंच्चक ढिंच्चक 🙂
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दो टका , बारह टक्का से डायरेक्ट ……..सौ टका

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राहुल गांधी ने कहा है कि वे आगामी चुनाव के लिए कमर कस रहे हैं और इन दिनों इंडियन आइडल जूनियर और डी आई डी जूनियर के सारे पिछले एपिसोड देख रहे हैं , उन्हें यकीन है कि इससे उन्हें पी एम जूनियर वाला रियल्टी शो में मदद मिलेगी
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बैंकिंग क्षेत्र में अगले साल दस हज़ार बैंक खोले जाएंगे , उनमें से पांच हज़ार तो सिर्फ़ टमाटर और प्याज लोन देने के लिए ही एक्सक्लुसिवली खोले जाने हैं
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सीबीआई जांच से पता चला है कि चीनी सेना इन दिनों सीमा पर जो कुछ कर रही है वो असल में खो खो खेल का मॉक ड्रिल कर रही है , खेल भावना से छुपन छुपाई खेल रही है बस
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राहुल गांधी ने अपनी पिछली क्लास में कहा कि हमें सच बोलना चाहिए , पिरधान जी सकुचाए शर्माए से बोले ………..बेहोशी अच्छी , खामोशी अच्छी ..बोलना ही क्यूं चाहिए
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योजना आयोग का कहना है कि 27 रुपए कमाने वाले को गरीब नहीं मानने वाला आंकडा सरासर गलत आंकडा था , असल में 28 रुपए कमाने वाला गरीब नहीं है …ओह इतना भारी अंतर
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आय एक रुपए बढाकर सरकार ने घटाए 17 करोड गरीब , प्रधानमंत्री का कहना है कि उनके इकोनोमिक्स पढे होने का देश को यदि इतना भारी फ़ायदा पहुंच रहा है , तो उन्हें भी खुशी है
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प्रधान जी इन दिनों दुविधा में हैं कि किसकी निंदा पहले करें , चीनी सबके छुपन-छुपाई खेलने की या राजधानी में आधी रात को लफ़ंडर बाइकरों के उत्पात की …….फ़िर डिसाइड किए कि ..ठीक है ,वही खामोशी, वही बेहोशी और वही पिरधान जी
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कैग करेगा राजधानी के ड्रेनेज़ सिस्टम का ऑडिट , हां आखिर वो ड्रेन के कीडों का ऑडिट भी तो करता ही रहा है बरसों से
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भारतीय चिट्ठियों के वहां पहुंचने पर सुना है कि ओबामा चचा कहे हैं जवाब में : बस्स यही एक कारण है कि हमारी पुलिस इन्हें वस्त्र उतारन जांच प्रोसीज़र से गुजारती है
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सरकार ने आज हरियाणा में किसानों को मुआवजे के रूप में दो रुपए से लेकर चार और छ: रुपए की भारीभरकम राशि का चेक जारी किया , लगता है जल्दी ही गरीब कटेगरी में भी लेयर बनाना होगा ..दो रुपए वाला मोस्ट लोअर गरीब , मिडल लोअर गरीब , अपर लोअर गरीब टाईप से
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जिस तरह से वसंत विहार केस में बचाव पक्ष के गवाह के रूप में लोगों का नाम लिया जा रहा है , हमें लगता है कि देर सवेर उन सबको बुलाया जा सकता है जिन्होंने इससे संबंधित खबरें भी देखी पढी हों
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जिस तरह से सरकार ने गरीब होने के लिए 28 रुपए तय किये है उस हिसाब से एक किलो टमाटर खरीदने वाले को अमीर घोषित करने में कोई हर्ज़ नहीं है
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मोदी को वीज़ा न दिए जाने वाली चिट्ठी पर सांसदों ने अपने हस्ताक्षर होने से इंकार किया , बदले में अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा है मैं भी फ़िर ओबामा नहीं हूं
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इशरत मामले में ,गृह मंत्रालय के खिलाफ़ हाई कोर्ट जा सकती है सीबीआई, बदले में गृह मंत्रालय को सीबीआई के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट चले जाना चाहिए , ताकि मैच विधिवत चलता रहे
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गजब ट्रेजेडी है जी , इस सरकार के एक ठो हाकिम , पच्चीस तीस लाख रुपया का सरकारी शौचालय ही तैयार करा दिए , आ दूसरका हाकिम पांच रुपया में भरपेट खाने की बात कर रहे हैं , अब पांच रुपए का खा के आदमी इत्ता महंगे वाले में आखिर करेगा क्या ….हमें तो पूरा शक है कि कुल पांच रुपए के खाने से तो भरपूर गैस भी न उत्सर्जित हो पावेगी उंह्ह्ह ..हाय हाय , कित्ती ट्रैजेडी है जी
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पांच रुपए में खाने वाले बयान पर दिग्विजय सिंह जी ने स्पष्ट किया है कि बेशक आज के लिए ज्यादा कवरेज ये वाली बकवास ले जाए लेकिन कल वो ज्यादा बडा वाली करके दिखाएंगे
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राज़ बब्बर आज से खाली बब्बर रह गए हैं क्योंकि ” राज़ ” तो उन्होंने आज खुद ही खोल दिया ये बता के कि मुंबई में बारह रुपए में भरपेट खाना खाया जा सकता है
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जांच अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की है कि जिस दिन से मोदी ने गाडी के नीचे पिल्ले टाईप कुछ कहा था , उसी दिन से किसी बहुत युवा राजनीतिज्ञ ने पदयात्रा वाला सैक्शन ही हटा दिया क्लास से
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क्रिकेट में ,भारत की जीत , ने साबित किया है कि हम अच्छे फ़ार्म हैं ……सट्टा विशेषज्ञ श्री बिंदु दारा सिंह
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कल के पनटकिया बयान के बाद बकवास की नेशनल रैंकिंग में बेशक मसूद जी ने धमाकेदार उछाल मारी थी लेकिन आज नटराज फ़िर चैंपियन की दर्ज़ पर दिग्गी रज्जा फ़िर फ़र्स्टर्म फ़र्स्ट आ गए हैं
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गोपाल कांडा पर दुष्कर्म का मुकदमा नहीं चलेगा यानि अब वे अपनी कांडा एयरलाइंस चला कर नए कांड के लिए एकदम्म फ़ीरी हो गए हैं
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दिग्विजय सिंह का कहना है कि कल पांच टके और बारह टके पर बंद हुआ बाज़ार आज उनके दो कौडी के बयान से सौ टके पर पहुंच गया …………इकोनोमिक्स जिंदाबाद
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कनटाप …….माने सीधा कनपट्टी पे :)

 

 

 

 
आम लोगों के मरने पर सरकार फ़ट्ट से मुआवजे की घोषणा कर देती है , जनता को भी चाहिए कि सरकार के लिए मुआवजा घोषित करे , मर तो वो कबकी चुकी है
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उत्तराखंड सरकार का कहना है कि अभी रुपया लुढक रहा है , एक बार पकड में आ जाए तो मुआवजे का काम भी शुरू कर दिया जाएगा
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आस्ट्रेलिया की क्रिकेट टीम अक्तूबर में भारत आएगी , हमारी तैयारी पूरी है -बिंदु दारा सिंह
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झारखंड में कांग्रेस+झामुमो सरकार बनाएंगे : “लुटेरा” प्रदर्शन के लिए तैयार है
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सीबीआई सेवक है , “तोता” है , हाकिम नालायक है ,”खोता” है ….
दोनों ही खोते दे पुत्तर
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गोपीनाथ मुंडे द्वारा चुनाव में आठ करोड खर्च करने की बात को सभी दलों ने अनुचित माना है , सबका कहना है , सुनाव में दारू-पानी का खर्च यूं सार्वजनिक करना गलत है
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मानसून सत्र से ठीक पहले खाद्य सुरक्षा अध्यादेश लाने की आलोचना पर सरकार ने विपक्ष को याद दिलाया है कि , संसद सत्र अब सिर्फ़ “हंगामा है बरपा और ठ्प्प ठप्प ” खेलने के काम आता है , अध्यादेश विधेयक के लिए नहीं
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दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार तीन पार्टियां सामने हैं , “जाप पार्टी “, “पाप पार्टी “आउर “आप पार्टी “, बकिया बचा खुचा है ” भाप पार्टी “, लप्प से उड जाएगा
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दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय चमडा मेला शुरू , विदेशी व्यापारियों ने भारतीय चमडे में दिखाई दिलचस्पी खासकर नेता मंत्री लोगों की चमडी में , उसकी बेशर्म और मोटी क्वालिटी के कारण
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जिस तरह से मिस्री लोगों ने मुर्सी कुर्सी की ठोंक पीट करके उसे उलट दिया , उन्होंने साबित कर दिया है कि वे सिर्फ़ “मिस्री ” नहीं “मिस्त्री “भी हैं
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इतना फ़र्जी फ़र्जी सुनकर पब्लिक कंफ़्यूज़ है कि , आखिर फ़र्ज़ी है कौन , मुठभेड , खुद इशरत जहां , या सीबीआई
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राहुल ने अपनी अम्मी से पूछा है कि क्या वे डॉ.(मनमोहन सिंह) के यहां कंपाउंडरी करके अपने कैरियर की शुरूआत कर सकते हैं , आफ़्टर आल कंपाउंडर भी घणा नोट पीट रहे हैं न 🙂
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मनमोहन सिंह का परफ़ारमेंस देख कर इकोनोमिक्स असोसिएसन ने फ़ैसला किया है कि अब इन्हें डा. मनमोहन सिंह नहीं बल्कि कंपाउंडर मनमोहन सिंह ही कहा जाएगा 🙂 ओह राहुल का कैरियर तो शुरू होने से पहले ही खतम हो गया 🙂
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नोट :- ये एक पंक्ति की टिप्पणियां , आम आदमी के मन में ,आसपास के समाचारों , घटनाओं पर बेसाख्ता निकले हुए कुछ शब्द हैं जिन्हें पिरो कर आपके सामने रख दिया है